सारागढ़ी की लड़ाई (निक्की कविता)

आओ सुनाऊँ तुम्हे “सारागढ़ी की लड़ाई” की कहानी !
भागे नहीं, उन इक्कीस बहादुरों ने चुनी मौत सुहानी !

बात चलती है, बारह सितम्बर अ ारां सौ सत्तानवे से !
हमला किया दस हज़ार आदिवासियों और अफगानों ने !
सिख रेजिमेंट की छतीसवीं बटालियन, अंग्रेजी राज में !
लड़े वो जीवट, जिंदगी की आखिरी सांस लेकर हाथ में !

आओ सुनाऊँ……

दुश्मन था चाहता कब्ज़ा, दो किलों के संचार तंत्र पे !
सिख्ख रेजिमेंट का था इरादा, भागना नहीं मोर्चे से !
गुरमुख सिंघ ने था दिया, सिग्नल कर्नल हग्टन को !
दुश्मन ने घेरा लिया किला, सेना की और मदद दो !

आओ सुनाऊँ……

मदद ना दे पाउँगा समय पर, हग्टन का था इनकार !
मरेंगे लड़ते लड़ते, ललकारा था इशर सिंघ हवलदार !
लड़ते मरे, हर एक ने हंस के लिया मौत का उपहार !
दीवारे टूटीं, आमने सामने की लड़ाई से मची चीत्कार !

आओ सुनाऊँ……

हंस के जिया, शहीदी जाम पिया, हर वीर सपूत ने !
सैकड़ों को मारा, दिखाया युद्ध कौशल हर तरह से !
हर एक ने अदम्य साहस से पाया बड़ा पुरुस्कार है !
ना कभी हुए, ना होंगे ! वीर उन जैसे इस जहान में !

आओ सुनाऊँ तुम्हे “सारागढ़ी की लड़ाई” की कहानी !
भागे नहीं, उन इक्कीस बहादुरों ने चुनी मौत सुहानी !

– बलविंदर सिंघ बाईसन

 

नोट : कृपया गलतियाँ सुधारने में मेरी मदद कीजियेगा ! एक कोशिश की है ! ईस्ट-कोस्ट, अमेरिका के मित्र स. अवतार सिंघ के प्रेरणा से लिखा !