तुम कलाकार ! (निक्की कविता)

सुविधा देखो तुम हमेशा अपनी, भाड़ में जाए ज़माना !
नुक्सान चाहे हो जाए दुनियां का, तुमने बस कमाना !

कलाकार हो तुम इस समाज में, ये हमें भी अब पता है !
हम रह गए शरीफ अनाड़ी, इसमें हमारी क्या खता है ?

तुम चलाते हो दुनियां को, तुम चराते हो उसको घाँस !
पी लेते हो खून, खा लेते हो गोश्त, नोच लेते हो मांस !

तुम्हारी चालबाजियों की दुनिया को अब खबर हो गयी !
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, कहानी पुरानी हो गयी !

हम ने पी.एच.डी. की ान ली है, कलाकारी विचित्र !
जवाब मिलेगा हर दांव का, ये अब याद रखना मित्र !

- बलविंदर सिंघ बाईसन