नकली शोध ! (निक्की कहानी)

नकली शोध ! (निक्की कहानी)
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मनोज : आज का पंजाब केसरी पढ़ा तुमने ? इसके हिसाब से भारत और अमरीका में दाढ़ी वाले पुरुषों के लेकर एक शोध किया गया है जिसमें पाया गया कि दाढ़ी रखने वाले 86 प्रतिशत भारतीय मर्द और 65 फीसदी अमरीकी मर्द रूढि़वादी, झगडालू, चोर प्रवृति के, अपनी पार्टनर के प्रति कम वफादार और रिश्ते निभाने में भी छल करते हैं। सर्वे के अनुसार दाढ़ी में बैक्टीरिया पनपने के खतरे के कारण स्वास्थ्य के लिए खतरा हो सकता है !

किशोर (हँसते हुए) : इसका मतलब हमारे सभी पूर्वज, ऋषि-मुनि, राजा, क्षत्रिय, देव आदि सभी इसी प्रवृति के होंगे, क्योंकि वह सभी केशधारी थे ! पाश्चात्य समाज में भी बहुत से दार्शनिक दाढ़ी-केश रखते थे और रखते हैं ! जिस किसी ने भी इस वाहियात सर्वे को अंजाम दिया है वो महा-धूर्त होगा और किसी छुपे हुए मंतव्य या किसी धार्मिंक कुं ा को शांत करने के ऐसा लेख लिखा है !

मनोज : मुझे तो लगता है की किसी धर्म विशेष की भावनाओं को प्रताड़ित करने के लिए किया गया यह कोई कुकर्म है ?

किशोर : हो सकता है ! पर लिखने वाले घनचक्कर ने इस चक्कर में अपने पूरे इतिहास को कलंकित करने में कोई कमी नहीं छोड़ी ! अगर एक ऊँगली उसने किसी धर्म विशेष पर की भी तो बाकी की सारी उँगलियाँ अपने ही धर्म के इतिहास पर तान दी हैं ! बाकी बात रही बैक्टीरिया की तो स्वच्छता के अनुसार यदि व्यवहार किया जाए तो शरीर के सभी अंग स्वस्थ रह सकते हैं ! अस्वच्छता शरीर के किसी भी अंग में हो बैक्टेरिया अपना असर दिखाएगा ही !

मनोज : सभी को अपनी मान्यताओं के साथ रहने और जीने का बराबर का अधिकार है ! हम अक्सर यही गलती करते हैं की केवल और केवल हमारा ही धर्म श्रेष् है पर असल भावना यह होनी चाहिए की हमारा धर्म बहुत सुंदर है और दुसरे का भी उतना ही श्रेष् और सुंदर ! एक खूबसूरत उधान की खूबसूरती विभिन्न फूलों से होती है ना की केवल एक ही रंग और प्रजाति के फूलों से ! पर कौन समझाए इन धर्म के अंधों को जिन्हें धर्मान्धता में केवल अपना ही धर्म सही नज़र आता है !

किशोर (गाते हुए) : खुद जियो औरों को भी जीने दो, यही तो है जिंदगी का रास्ता ! तुम्हें अमन का, शान्ति का वास्ता ! जो लड़ना है तुम्हें तो लड़ो फूट से, ये फूट सारे राष्ट्र को जला रही ! मिटा दो जातपात, लड़ो भूख से, जो भूख सारे राष्ट्र को है खा रही ! है खेलना है जो खून से तो आओ फिर, तुम्हें सीमा देश की बुला रही !

शोध करना है तो एकता पर करो ना की साम-दाम-दंड-भेद की कला पर ! मुझे भी याद आता है बचपन में सुना हुआ ये जिंगल "हिन्द देश के निवासी, सभी जन एक हैं ! रंग, रूप, वेश, भाषा सारे अनेक हैं ! फूल हैं अनेक, किन्तु माला फिर एक है !" (हँसते हुए मनोज ने गाया)

- बलविंदर सिंघ बाईसन