सर्दी हो या गर्मी, पगड़ी है बननी ! (निक्की कहानी)

मेरा सर दर्द करता है, मैं पगड़ी नहीं बाँध सकता ! (परेशान हो कर मनवीत ने कहा)

अच्छा ? और कोई परेशानी तो नहीं, पगड़ी बाँधने में ? (अन्दर से हँसते हुए साहिब सिंघ ने पूछा)

मनवीत सिंघ : गर्मियों में तेज़ धूप होती है तो पगड़ी नहीं बांधी जाती ! गर्मी लगती है .. वगैरा वगैरा !

साहिब सिंघ : चल कोई बात नहीं ! मैं तुझे नहीं रोकता पर मेरी कुछ बातों का जवाब तो देगा ना /

मनवीत सिंघ : हाँ ! हाँ ! आप पूछो ना ? बस यह काम मत कहो !

साहिब सिंघ : जब किसी का सर दुखता है तो वो क्या करता है ?

मनवीत सिंघ : लो, यह भी कोई पूछने की बात है ? वो कस के माथे पर पट्टी बांधता है ! अगर पट्टी से कोई फर्क ना पड़े तो दवाई भी खा सकता है !

साहिब सिंघ : अच्छा ! जब लू चलती है तो लोग गर्मी की दोपहर कैसे बाहर निकलते हैं ?

मनवीत सिंघ : ज्यादा गर्मी में लोग टोपी, गमछा इत्यादि ले कर सर ढक कर चलते हैं !

साहिब सिंघ : जब ज्यादा ण्ड (सर्दी) होती है तो लोग क्या करते हैं ?

मनवीत सिंघ : लोग ऊनी टोपी पहनते हैं, मफलर बाँध लेते हैं सिर पर, तांकि ण्ड कानों और सिर को ना लगे !

साहिब सिंघ (हँसते हुए) : फिर एक बात बता ! जब सिर के समय कोई कपडा बाँध लेने से लोगों का सिर दर्द दूर हो जाता है तो मेरे भाई हम तो यह काम रोज़ ही करते हैं ! अगर गर्मियों में सर ढ़कने से गर्मी नहीं चढ़ती तो हम तो रोज़ ही पगड़ी बांधते हैं ! (एक बार ध्यान से मनवीत की तरफ देखता है) ! अगर सर्दियों में सिर ढ़कने से ण्ड नहीं लगती तो मेरे भाई हम तो यह कार्य पहले से ही कर रहे हैं !

मनवीत सिंघ (कुछ समझने की चेष्टा करते हुए) : आप कहना क्या चाहते हो ?

साहिब सिंघ : बहानों से नहीं बल्कि इच्छा शक्ति से कार्य होते हैं ! विचार करो की मैंने क्या कहा है !

मनवीत सिंघ (बात पर विचार करने की बाद) : ओह ! मैं इतनी छोटी सी बात ना समझ सका ! लानत है ! पर मैं अब समझ गया भाई साहिब की दर्द दस्तार (पगड़ी) के कारण नहीं बल्कि मेरी कमजोर सोच के कारण महसूस हो रहा था ! आगे से बहानेबाजी बंद और दस्तार (पगड़ी) बांधना शुरू ! (हँसता है)

- बलविंदर सिंघ बाईसन