अडल्ट सिनेमा ! (निक्की कहानी)

माफ़ कीजियेगा भाई साहिब, बच्चे आप के साथ फिल्म देखने नहीं जा सकते क्योंकि इस फिल्म को “ए सर्टिफिकेट” मिला है ! (गेट कीपर ने अशोक को रोकते हुए कहा)

उसकी बात पर सहमती दर्शाते हुए अशोक ने सिनेमा हॉल के टिकेट मैनेजर से बातचीत कर दूसरी फिल्म की टिकटें ले लीं जिसको “यू सर्टिफिकेट” मिला हुआ था और बीबी-बच्चो के साथ फिल्म देखने हाल में जा कर बै गया !

ट्रेलर शुरू हो गए … हीरो अपने दोस्त को बोल रहा था “तब से गन चला रहा हूँ जब से तूं अपनी मां के अन्दर नहीं, अपने बाप के अन्दर था”, (अशोक ने सकपका पर अपने बच्चो की और देखा)

अगले ट्रेलर में हीरोइन और उसके साथ के डांसर टू पीस बिकनी पहन कर अश्लील डांस कर रही थी ! हीरो-हिरोइन के लिप लॉक हो रहे थे ! (अशोक ने चोर नज़रों से बीबी-बच्चो की तरफ देखा तो बीबी मधु उसी की तरफ आँखों में प्रशन लिए देख रही थी)

अशोक के मन में प्रशन था … ए सर्टिफिकेट की फिल्म बच्चे देख नहीं सकते परन्तु वो सारे सीन जो किसी फिल्म को “ए सर्टिफिकेट” के काबिल बनाते हैं वो “यू सर्टिफिकेट” फिल्म की शुरुवात और मध्यांतर में ट्रेलर के रूप में ही दिखा दिए गए तो फिर क्या फायदा हुआ बच्चों को अडल्ट फिल्म देखने से रोकने का ???

कब फिल्म शुरू हुई, कब ख़त्म हुई, अशोक को पता तब चला जब मधु ने उसका कन्धा पकड़ कर हिलाया और पुछा “सो गए थे क्या ?”

अशोक (सीट से उ ते हुए) : सोया तो सेंसर बोर्ड है … सोया तो समाज है ! एक मैं भी सो गया तो क्या हो जाएगा ? पर मैं नहीं सोऊंगा, क्योंकि आज मैं जाग गया हूँ ! मैं अलख जगाऊंगा “समाज में” और इस दोगलेपन को बेनकाब करूँगा !

- बलविंदर सिंघ बाईसन