रास्ते का चुनाव ! (निक्की कहानी)

सांभर चावल बीस रूपए प्लेट ! पैसे खुल्ले देना भैया !

(शक्ल से अच्छे घर की दिखने वाली बाईस-तेईस साल की लड़की साप्ताहिक बाज़ार में घूम-घूम कर सांभर-चावल बेच रही थी ! यह देख कर अपनी बीबी के साथ सब्जी लेने आया विनोद चौंक गया ! )

अरे यह तो आरती है, हमारे पड़ोस में ही रहती थी ! क्या हाल बना रखा है इसने ? (विनोद ने अपनी बीबी सरोज को बताया)

आरती ! (मनोज ने पुकारा) आरती ने पलट कर देखा और मनोज को पहचान कर उसके पास चली आयी !

मनोज (हैरानी से) : तूं यह मेहनत मजदूरी क्या कर रही है और तेरे पति कहाँ है ?

आरती (दोनों को संबोधित करते हुए) : सात महीने पहले उनको पक्षाधात हो गया था, रिश्तेदार और दोस्त, सबने नज़रे फेर लीं ! जो साथ देने के बहाने आये भी तो उनकी गिद्ध निगाह मेरे शरीर पर थी ! शरीर बेचना मुझे गवारा नहीं था और ज्यादा पढ़ी लिखी तो हूँ नहीं, इसलिए यह काम शुरू कर लिया ! इज्ज़त की दो रोटी मिल रही है ! कुछ पैसा इक ् ा हो जाए तो टिफिन सर्विस भी शुरू कर दूँगी ! अच्छा भैया, चलती हूँ !

आरती के जाने के बाद सरोज ने मुंह बनाते हुए कहा : कोई आसान काम ढूंढती ! यह कहाँ सड़कों पर धक्के खा रही है ?

विनोद (समझाते हुए) : शरीर और ज़मीर बेच कर कमाई करना आसान रास्ता है ! वो चाहती तो वो भी “पंखा देख कर” आसानी से पैसे कमा सकती थी ! मेहनत और इज्ज़त से रोटी कमाना थोडा मुश्किल हो सकता है पर जो बरकत, ख़ुशी और संतुष्टि इस कमाई से मिलती है वो वर्णन से परे है ! आरती की ये छवि किसी देवी की भांति मुझे छू गयी है ! ऐसी सुपत्नी पाकर कोई भी पति अपने को धन्य महसूस कर सकता है और उसे अपने इसी जन्म को स्वर्ग प्राप्ति समझना चाहिए ! (विनोद की आँखें भर आती हैं)

अब चलें ? या यहीं खड़े हो कर देवी के गुणगान करने हैं ? (स्त्री-सुलभ इर्ष्या से भरी सरोज नाराजगी से बोली)

- बलविंदर सिंघ बाईसन