तस्वीर बनाता हूँ ! (निक्की कहानी)
किसी को गुरु साहिबान की असली फोटो / नकली फोटो के लिए लड़ते देखता हूँ तो बड़ी हैरानी होती है ! गुरु साहिबान को अगर सिख्खो को " मूर्त रूप" से जोड़ना होता तो " शब्द " को गुरु क्यों बनाते ? (सोशल मीडिया पर चल रहे वाद-विवाद की बात करते हुए रणवीर सिंघ ने कहा)
गुरदेव सिंघ : ठीक कहते हो भाई ! जब सिद्धों ने गुरु नानक साहिब से पूछा की तुम्हारा गुरु कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि "शब्द गुरु, सुरत धुन चेला ! " ! फिर चौथे गुरु रूप में उच्चारण किया "बाणी गुरु, गुरु है बाणी" !
रणवीर सिंघ " वह शब्द (बाणी) जो परमेश्वर (अकाल पुरख) का है ! जो अपने गुणों की भाँती सर्वत्र है ! उसका कोई रूप नहीं ! उसका कोई रंग नहीं ! उसका नाम युगों से है और रहेगा ! वो शरीर रूप (मूर्त रूप) में नहीं आता, भाव जन्म नहीं लेता इसलिए वो मरता भी नहीं ! वो ना डरता है और ना डराता है ! गुरु अपने शब्दों द्वारा उसी परमात्मा गुरु से जुड़ने का उपदेश देते हैं, जो उपरोक्त गुणों का मालिक है !
गुरु शब्द से परिचय ना होने के कारण पर कई गुरुद्वारों में और घरों में भी लोग फोटो लगा कर माथा टेकते हैं और कई तो धुप-अगरबत्ती भी करते है ! कई तो दावा करते हैं की उनके द्वारा दी गयी तस्वीर ही असली गुरु की तस्वीर है ! पर गुरु तो ज्योति स्वरूप (ज्ञान स्वरूप) हैं फिर कोई कैसे गुरु या परमात्मा को मूर्त (फोटो, मूर्ती) बना सकता है ? (मनोज ने पूछा)
कोई कलाकार / फिल्मकार / चित्रकार / कलहकार चाहे जिस भी प्रकार अपनी सोच से गुरु का चित्रण करे पर वो कभी भी शब्द गुरु को मूर्त-रूप में दर्शा नहीं पायेगा ! ज्ञान और भावना (दोनों का सुमेल) के रंग किसी भी ब्रश के रंग से ज्यादा गाढ़े होते है !
परमात्मा के रंग में डूबे एक गीतकार ने अजब खुदाई गाना गाया है
" तस्वीर बनाता हूँ " ..... " तस्वीर नहीं बनती " .... " तस्वीर नहीं बनती "