Nikki Kahani
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ਹਰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਹੈ ਇੱਕ ਨਿੱਕੀ ਕਹਾਣੀ
Balvinder Singh Bison

रोम-रोम रोमांटिक ! (निक्की कहानी)

क्या माहौल हो गया है आज कल ! क्या लड़के और क्या लड़कियां, जिसे देखो उसकी निगाह गन्दी है ! (मनोज ने मित्र दीपक के सामने अपने दिल का दर्द ब्यान किया)
अगर हम लडके आज से ही सभी जानने वाली, साथ में काम करने वाली और अनजान औरतों को व लडकियों को मैडम की बजाय या नाम लेने की बजाय 'बहनजी' और इसी तरह लडकियां सब लडकों को 'भाई' बोलना शुरू कर दें, जैसा की आज से 15-20 साल पहले तक होता था.. तो आपको क्या लगता है की समाज में कुछ बदलाव आएंगे? (दीपक ने पूछा)
मनोज (हँसते हुए) : भाई, कुछ बदलाव नहीं आएगा .. क्योंकि "बहन बोलने" और "बहन समझने" में अंतर होता है ! पुलिस के रिकार्ड गवाह हैं की बलात्कार के पिचासी प्रतिशत से ज्यादा केसों में बलात्कारी जानकार होता है !
दीपक : बच्चे भी क्या करें ? हमारी फिल्मों में तकरीबन हर गाने में लड़की-लड़का का प्रेम, चुम्बन, अंगप्रदर्शन, आईटम डांस दिखाया जाता है ! चाहे कोई शादी हो या जन्म दिन की पार्टी या कोई भी सामाजिक कार्यक्रम, उनमें डी.जे. पर बजते "प्रेम मिलन" और "कामुकता" भरे गाने जाने-अनजाने छोटे छोटे बच्चों के दिमाग में कामुकता भर रहे हैं !
और जब यही फ़िल्मी काम बच्चे करते हैं तो समाज उसे बुरा समझता है पर समाज यह नहीं समझ रहा की इन बच्चों में यह विचार उसने ही भरे हैं ! अश्लील गाने पर खुद नाचता एक बाप अपनी बेटी को कैसे रोकेगा ? और अगर रोकेगा भी तो बेटी के सवालों के जवाब कैसे देगा ? की पापा मेरी तो परवरिश ही इसी माहौल में हुई है तो फिर यह गलत कैसे हो गया ? (मनोज ने दीपक की बात को पूरा करते हुए कहा)
मनोज : समाज को अपनी मानसिकता बदलनी होगी ! पाश्चात्य समाज के अच्छे गुण को अपनाए नहीं हमने पर बुराई को बाहें पसार कर अपना लिया है ! आज खुले आम शराब जगह जगह बिक रही है, हुक्का बार खुल रहे है, मसाज सेंटर कुकरमुत्ते की भांति पसर रहे हैं, डिस्को बार पर शराब के आगे पानी पनाह मांगता है, अब तो भारत देश में अश्लील फिल्मों ने भी अपने पैर जमा लिए है जिन्हें शायद पति-पत्नी भी एक साथ बैठ कर नहीं देख सकते !
पत्नी से याद आया की मुझे घर जाना है क्योंकि पत्नी के साथ "मस्तीजादे" देखने का प्रोग्राम फिट है ! अच्छा अब चलता हूँ ! (दीपक ने अपना प्रोग्राम बताया)
इस समाज का तो "‘रोम-रोम रोमांटिक है…" इसका कुछ नहीं हो सकता ! बदलाव की बात करके भूलने से नहीं बल्कि दृढ इच्छाशक्ति से ही बदलाव आते हैं ! (मनोज माथे पर हाथ मारता है !
- बलविंदर सिंघ बाईसन

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