मछली की आँख ! (निक्की कहानी)
बुरा हुआ ! ईमानदार मुख्यमंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया ! आज देश की जनता को भी आत्म-मंथन करने की जरूरत महसूस हो रही है ! (सुरेश बता रहा था)
रमेश (हंसी उड़ाते हुए) : ये तो होना ही था ! तुम्हारे अर्जुन (मुख्यमंत्री) को केवल मछली की आँख (लोक सभा चुनाव) ही नज़र आ रहे थे ! सब ड्रामा था ड्रामा ! अपनी नाक बचाने को ! हमारे एक मेंबर ने उनकी टेबल पर अदरक रख दी थी ... मतलब पता है ना अदरक वाली कहावत का ? उन्होंने लोकपाल के लिए नहीं बल्कि लोकसभा के लिए इस्तीफ़ा दिया है !
सुरेश (शान्ति से) : मछली की आँख पर निशाना होना गलत तो नहीं ? निशाने पर पूरे धैर्य, एकाग्रता और ईमानदारी के साथ तीर चलाया जाता है तभी जीत हासिल होती है ! इस अर्जुन का निशाना "पूर्ण स्वराज" है और उसी निशाने के लिए उसने तीर चलाये, जिन तीरों की मार से विपक्ष त्राहि-त्राहि कर उठा !
रमेश : तो आपका मतलब है की इस कलयुग में एक नयी महाभारत की कहानी लिखी जा रही है ?
सुरेश (मुस्कुराते हुए) : सही कहते हो .. दुर्योधन (पुरानी पार्टी) तथा दुशासन (कम पुरानी पार्टी) बचपन से ही नहीं चाहते थे की अर्जुन सिद्ध योद्धा बने और सफलता की सीढियां चढ़े, इसलिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई और तरह तरह की चालों-कुचालों के दांव खेले गए !
रमेश (हँसते हुए) : जो भी है, हो गया ना राज्य निकाला ! चलो अब जाओ... बनवास पर !
सुरेश : गलती कर दी आप लोगों ने ! हमने तो पांच गाँव (दिल्ली लोकपाल) ही मांगे थे पर आपने सुईं की नोक जितना लोकपाल भी देने को भी मना कर दिया ! अब हम अपना हक़ जरूर मांगेगे और लोक-सभा में आ कर "पूर्ण स्वराज" तथा "देश व्यापी पूर्ण लोकपाल" लागू करवाने के लिए संधर्ष करेंगे और इस देश को दिल्ली में जो ईमानदारी का ट्रेलर दिखाया है, अब देश को उसी ईमानदारी की पूरी फिल्म दिखाएँगे !
रमेश (चिढाते हुए) : ये मुंह और मसूर की दाल ? तुम्हें शायद पता नहीं की "अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ! हुंह ! (मुहं फेर लेता है)
- बलविंदर सिंघ बाईसन
नोट : ये कहानी किसी ख़ास पार्टी को समर्थन देने के लिए नहीं लिखी गयी बल्कि एक खाका पेश करती है आज की राजनीति का !
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