साधू से संवाद ! (निक्की कहानी)
और बेटा कैसे हो ? सब कुशल मंगल ? (साधू नित्यानंद छह महीने बाद सुशांत को मिलने आये थे )
सुशांत : साधुवाद ! बहुत दिनों में आये इस बार आप ?
नित्यानंद : साधू घूमे गली गली, साधू घूमे देश ! जगत कल्याण के लिए ही धारा हमने ये वेश !
(जल पान प्रस्तुत करने के बाद सुशांत अपनी धार्मिक जिज्ञासाओं को शांत करने हेतु स्वामी नित्यानंद जी से वार्तालाप करने लगता है ! उसके प्रश्नों के उत्तर देने में असमर्थ स्वामी जी परेशानी अनुभव करते हैं और थोडा गुस्से से बात करते हैं)
सुशांत : स्वामी जी, मैंने एक बात नोट की है की जब भी मैं आप से कोई प्रशन पूछता हूँ तो आप इधर उधर से कोई कविता यां शेर, कहानी या दोहा सुना कर बात को बदल देते हैं ! आप मुझे मुख्य धर्म ग्रंथों से ज्ञान क्यों नहीं देते ? जैसे वेद, पुराण, उपनिषद इत्यादि से !
मेरे एक मित्र हैं सुखजीत सिंघ जी, वह भी इसी बात से परेशान हैं की उनके धर्म में भी जो साधू (संत) रूप में नज़र आते हैं वो भी इसी प्रकार कच्ची रचनाओं को पढ़कर और गाकर संगतों का दिल बहलाते हैं पर असल "श्री गुरु ग्रन्थ साहिब" में जो दर्ज है उसे बताने में अक्सर गुरेज़ करते हैं !
नित्यानंद (बात बदलते हुए) : मैं आपके पास एक सेवा ले कर उपस्थित हुआ हूँ ! आप पांच रजाई की सेवा कबूल कीजिये और साथ में एक हज़ार रूपए !
सुशांत (बात समझते हुए) : माफ़ी चाहता हूँ स्वामी जी ! पर आज कल मैं अपनी सारी सेवा गरीब बच्चों की पढाई और उनके उत्थान के लिए खर्च कर रहा हूँ ! मैं जलपान के अलावा आपकी कोई सेवा नहीं कर सकता !
नित्यानंद (गुस्से से) : तो मै चलता हूँ और दुबारा तुम्हारे पास नहीं आऊंगा क्योंकि तुम सेवा तो करते नहीं हो हमारी ! तुम्हारे पास आ कर समय व्यर्थ क्यों गवाना !
सुशांत : स्वामी जी ! आप आते हो तो हमारा सत्संग हो जाता है ! उत्तम विचारों का आदान-प्रदान हो जाता है ! क्या उस सत्संग का आपके विचार में कोई मोल नहीं है ? केवल पैसे से सेवा करने से ही आप प्रसन्न होते हैं ?
नित्यानंद : जो हमारी सेवा ना कर सके तो हमें उससे क्या काम ? (अपना झोला और छड़ी संभालते हुए वहां से प्रस्थान कर जाता है)
सुशांत सोचने लगता है की स्वामी जी ने जगत दिखावे के लिए तो दुनियां और भौतिकता छोड़ी है पर असल में वो आज भी उसी में खचित है ! मन ही मन सोचता है .. "इस से अच्छे तो हम हैं तो ग्रहस्थ आश्रम में रहते हुए भी प्रभु के राह पर चलने की सोचते हैं ! इन पाखंडी साधुओं के कारण आज पूरा साधू समाज बदनाम हो चुका है ! शायद मेरा दोस्त सुखजीत सिंघ अपने गुरु की बात ठीक ही दोहराता है की "जग मह उत्तम काडीएह विरले केई के " ! अच्छे मनुष्य कम ही होते है बाकी तो साधू के भेष में शैतान ही घूम रहे हैं !
तभी टी.वी. पर एक साधू द्वारा बलात्कार की घटना की खबर प्रसारित होती है ! सुशांत वितृष्णा से मुख मोड़ लेता है !
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