अवैध पुतले ! (निक्की कहानी)
हे धर्मराज ! एक अपराध की सजा तो एक बार ही होती है, पर मुझे तो ऐसे अपराध के लिए हर साल जलाया जा रहा है जो अक्षम्य भी नहीं है ! आप तो इन्साफ कीजिये ! (रावण की आत्मा अपना दुखड़ा सुना रही थी !
इससे पहले की धर्मराज कुछ बोलते वहां मौजूद नेता जी बीच में धर्म रक्षक बन कूद पड़े !
नेता जी : तुमने पराई स्त्री का अपहरण किया !
रावण (उपहास भरी नज़रों से देखते हुए) : पर मैंने कभी भी उनके शील पर बुरी नज़र नहीं डाली, मैंने बड़े ही धर्म-पूर्वक उन्हें अपने बाग़ में रखा और पूरी सेवा और रखवाली की ! मेरा अपराध तो केवल यही था ना ? जलाना है तो उन लोगों, उन नेताओं के पुतले जलाइए जो हर रोज़ पराई स्त्रीयों के शील भंग करते है ! जो अपने देश, राज्य की अस्मिता से रोज़ खेलते है ! मेरी छोटी सी गलती की सजा (अगर वाकई ही गलती थी ) तो मेरी मौत से ही पूरी हो चुकी है, फिर हर साल अवैध रूप से मेरे पुतले जलाने का क्या औचित्य है ?
धर्मराज : हे प्रकांड ज्ञानी रावण ! बात तो सही है आपकी ! मैं अभी इन्द्र से सलाह कर के आपके सारे "पुतले जो अवैध रूप से हर साल जलाए जा रहे है" को नष्ट करने की बात करता हूँ ! और आम जनता को आदेश देता हूँ की जलाना है तो "उन रावणों के पुतले जलाओ, जो कर्म और इन्द्रियों से रोज़ जाने कितने शील भंग करते है और अस्मितों से खेलते हैं !"
(नेता जी चुपचाप वहां से खिसक लेते हैं)
नोट : ये बातचीत 10 अक्टूबर 2013 की है ! 11 अक्टूबर को जोरदार बारिश में बहुत सारे अवैध पुतले नष्ट हो गए है और रावण को कुछ हद तक इन्साफ मिल गया है !
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