इन्साफ की उम्मीद ! (निक्की कहानी)
पर तुमने पहली बार तो मुलजिम के खिलाफ गवाही दी थी, फिर दूसरी बारी मुलजिम के पक्ष में और आज तुम फिर ब्यान बदल रहे हो ? मैं चाहूँ तो तुम्हारी गवाही रद्द कर सकता हूँ और तुम्हे गलत-बयानी के दोष में अन्दर भी कर सकता हूँ ! (जज साहिब कोर्ट रूम में बैठे एक दुर्दान्त सामूहित क़त्ल के केस की सुनवाई कर रहे थे)
गवाह (सर झुकाए) : जज साहिब, असल बात तो यह है की पिछले बीस साल से इस केस की सुनवाई हो रही है, कितने ही गवाह मर गए, कितने ही मार दिए गए पर इन्साफ के नाम पर सिर्फ आज भी गवाही ही चल रही है! कोर्ट से बाहर कोई देखने नहीं आता की हमारे साथ क्या हो रहा है ? हम गवाहों को साम, दाम, दंड, भेद सभी तरीके से डराया फुसलाया जाता है ! हमारी नौकरियां और कारोबार इन गवाहियों और तारीखों के चक्कर में बर्बाद हो रहे है ऊपर से हर तरफ से दबाव ! आखिर कब तक दबाव सहें ?
जज : तो इसका क्या मतलब है की तुम बार बार गवाही बदलोगे ? मैं मानता हूँ की कोर्ट से बाहर आपकी सुरक्षा का कोई इंतजाम हम नहीं करवा पाए और सरकारों, मंत्रियो, संतरियों और बहुत बार अपने ही लोगों की मिलीभगत के कारण ऐसे कितने ही केसों में लटक लटक कर इन्साफ मिलता है पर जब तक इन्साफ मिलता है तब तक अपराधी ही ख़त्म हो चुके होते है और इन्साफ मांगने वाले भी ! सारा कानून का ढांचा ही सबूत पर टिका है और सबूत ही ना रहे तो इन्साफ कैसा ? याद रखना, जब अपने ही गवाह मुकरते हैं तो गैरों से इन्साफ की उम्मीद करना व्यर्थ है !
गवाह (मन ही मन में फैसला कर के) : पहले मैं डर गया था, मुझे मेरा परिवार नज़र आने लगा था और अपने समुदाए के नेताओं से भी मुझे कोई भरोसा यां सहारा नहीं मिला ! चुनाव के समीप आने पर सब हमें सर पर उठा लेते है पर उसके बाद हमारे साथ जो व्यवहार होता है वो बताने से भी परे है ! हमने तो आज तक सिर्फ गवाया ही है पर हमारे उस गवानें की आड़ लेकर बहुत से लोग समाज के ज़ज्बात भड़का कर करोड़ों कमा रहे हैं ! जज साहब, चाहे मेरी जान चली जाए पर उन सैकड़ों बेगुनाहों के खून का इन्साफ जरूर होगा ! मेरी गवाही नहीं बदलेगी चाहे जो भी हो जाए !
जज : तुम जैसे निडर लोग सामने आने चाहिए, इन्साफ जरूर होगा ! धरती का सीना चीर कर होगा ! मैं आज ही तुम्हारी सुरक्षा का आदेश जारी करता हूँ !
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