शीशे का प्रतिबिंबन (लघु कथा)
हम शनिवार को कोई नया सामान नहीं खरीदते और ना ही पेमेंट करते है ! कल शाम को अगर यह सामान ले आते तो ठीक होता, लेकिन अब आप सोमवार को आना. (रमेश कुमार ने कहा ).
हरमस्तक सिंघ (आजकल का सयाना नौजवान ) : लाला जी, यह क्या बात हुई, सोम हो या शनि, दिन तो सभी एक जैसे ही होते है ! सामान आपके सामने है और आप ही ने मंगवाया था, अब यह चक्कर क्यों ?
रमेश कुमार : बड़े बुजुर्ग कहते थे की शनिवार को कोई सामान नहीं लेना और न ही पैसे देना. अपशकुन होता है, और लक्ष्मी नाराज़ हो के चली जाती है घर से !
हरमस्तक सिंघ : अच्छा ? पैसे देते भी नहीं और लेते भी नहीं हो ?
रमेश कुमार : क्यों नहीं लेते ? पैसे आते किसको बुरे लगते है ? (हँसता हुआ) पैसे देने वाले आजा...मांगने वाले चले जा !
हरमस्तक सिंघ (सूरमा भोपाली स्टाइल मार कर ) : "किया कह रहे हो खां" ? देने के लिए शनिवार बुरा और लेने के लिए बढ़िया ? दोगली नीति समझ नहीं आई ? धरम के नाम पर अपने फायदे के लिए इन वहम - भरम को बढ़ावा देते हो! पर सच्चाई यह है की आप भी लक्ष्मी-पुत्र (पैसे के पुजारी) हो ! आपसे बड़ा कोई आ जाए तो आपके यह सारे भ्रम टूट जाते है, लेकिन अगर कोई वेंडर या सप्लायर आ जाए तो आपके नखरे ही बढ़ जाते हैं ! क्या आप शनिवार को सफ़र नहीं करते, या सफ़र तो करते हो पर टिकट नहीं लेते ? हस्पताल जाते होगे पर वहां पैसे नहीं देते होगे ? होटल में खाना खाते होगे तो, बर्तन मांज कर आ जाते होगे लेकिन बिल नहीं उतारते होगे ?
रमेश कुमार (हैरान हो के कहता है ) : बस कर बेटा, सारी इज्ज़त की धज्जियाँ आज ही उड़ा दोगे क्या ? असल में इन पूजारियो ने हमें इन वहम-भरम में डरा के फ़सा के रखा हुआ है ! पर असल गलती हमारी अपनी है , कि हम अपना फायदा देखते हुए इसमें फंस के बह जाते है और वक्त के साथ यह वहम भरम देखा देखी लोगों में इतने अन्दर घुस जाते है कि एक आदत सी बन कर रह जाते है ! बेटा, तुम्हारे दिखाए हुए शीशे के प्रतिबिंबन ने आज मेरे अंतर्मन में भी चमक मार दी है, आओ आज से ही श्री गणेश करते हैं ! रखो सामान और ले जाओ अभी अपने पैसे !
हरमस्तक सिंघ : देर आईद...दुरुस्त आईद !
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