थोडा थोडा रावण ! (निक्की कहानी)
बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है यह रावण दहन ! (रोहित कुमार अपने बेटे विक्की को समझा रहे थे)
पर पापा, बुराई तो हर दिन के साथ बढती ही जा रही है ! आप ही तो बताते हो ना की धर्म पंख लगा कर उड़ गया है ! समाज में इतना पतन आ गया है की घर-घर "रावण के भी बाप" पैदा हो रहे हैं ! (विक्की ने अपना ज्ञान बखान किया)
रोहित कुमार (हँसते हुए) : अरे मेरा बेटा समझदार हो गया है ?
विक्की (मुकुराते हुए) : आप का ही बेटा हूँ ! वैसे भी पापा वो देखो एक तरफ रावण को बुराई का प्रतीक मानने वाले अन्धविश्वासी लोग जो अपने परिजनों की अस्थियों को हाथ लगाने से भी गुरेज़ करते हैं वो कैसे रावण की अस्थियाँ (जली हुई लकड़ियाँ) अपने घर ख़ुशी खुश ले जा रहे हैं !
रोहित कुमार (थोडा गंभीर हो कर) : वो तो बेटा रावण महाज्ञानी भी था ना, इसलिए !
विक्की : एक बात करिए ! अगर वो महाज्ञानी था तो जलाया क्यों ? अगर बुराई का प्रतीक था तो अपने घर क्यों ले गए उसकी अस्थियाँ ? मुझे तो लगता है की उन अस्थियों की आड़ में समाज के लोग बहुत सालों से "थोड़ी थोड़ी बुराई अपने घर ले जा रहे हैं" ! इसलिए आज समाज में "घर घर रावण की परिस्थिति पैदा हो गयी है" जो पढ़-लिखकर समझदार तो दिखते हैं पर अंधविश्वास, नैतिक तथा सामाजिक पतन की राह पर चल कर अपने दोगले व्यक्तित्व को प्रदर्शित कर रहे हैं !
रोहित कुमार (समझते हुए) : ठीक कहते हो बेटा ! रावण ने तो सीता को हाथ भी नहीं लगाया था पर आज के "रावण के बाप" केवल "हरण" नहीं बल्कि "चीर हरण" की भी हदें पार कर रहे हैं ! तेज़ाब द्वारा हमले, बलात्कार, शारीरिक और कुत्सित मानसिक छेड़छाड़ तथा गुंडों को समाज के कुलीन वर्ग एवं पुलिस द्वारा संरक्षण इस समाज में "बुराई की जयजयकार को प्रदर्शित कर रहे हैं !
विक्की : पापा ! आप तो ज्यादा ही ज़ज्बाती हो गए ! चलो छोड़ो, चल कर जलेबी खाते हैं और अपने कड़वे वार्तालाप को कुछ मीठा करने की कोशिश करते हैं !
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