Nikki Kahani
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ਹਰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਹੈ ਇੱਕ ਨਿੱਕੀ ਕਹਾਣੀ
Balvinder Singh Bison

जंगली भेडिये ! (निक्की कहानी)

सामूहिक कत्लेआम के बाद इन्साफ के लिए 30 साल का लम्बा इंतज़ार, पर मिला क्या ? मुआवज़े की हड्डियाँ जो हमारे अपने ही खून से लबरेज़ हैं ! (गुस्से से भरे हरबीर सिंघ का चेहरा लाल था)

किसी भी बात को कहने या करने के दो तरीके होते है, एक वो जो दूसरों को कहने सुनने में अच्छा लगता है और दूसरा जो सच होता है ! (रणवीर सिंघ बोला)

हरबीर सिंघ : मतलब ?

रणवीर सिंघ : यह राजनीतिज्ञ आम जनता को बेवकूफ समझते हैं और बहुत हद तक ठीक ही समझते हैं ! कोई भी इस प्रकार की घटना या कत्लेआम बिना किसी राजनितिक संरक्षण के बिना हो ही नहीं सकता परन्तु यह लोग उस के बाद ऐसी ऐसी बाते करते हैं जो समाज के दुसरे वर्गों को सुनने में अच्छी लगती हैं जैसे की "हमने मुआवजा दे दिया" या "इन्साफ में देर कानून की तरफ से है, हम अपनी तरफ से हर प्रकार के सहयोग के लिए तैयार हैं" ! किन्तु उस बात की असलियत या सच्चाई कुछ और ही होती है क्योंकि सत्ताधारी पार्टी द्वारा अपने हर उस कृत्य पर पर्दा डालने की और कानूनी प्रक्रिया को लंबित और लम्बा करने कुचेष्टा की जाती है तांकि इन्साफ मांगने वाले परेशान हो कर हिम्मत छोड़ दें या गरीबी में ही घिसट घिसट कर मर जाएँ !

हरबीर सिंघ (आंसू पोंछते हुए) : इन्साफ का दिखावा करने के लिए कितने ही कमीशन बनाए गए और रिपोर्ट पेश करने से पहले ही तोड़ दिए गए ! कितनी ही पुलिस रिपोर्ट नदारद हो चुकी हैं और कितने ही सबूत नष्ट या भ्रष्ट कर दिए गए ! कोढ़ में खाज की तरह हमारे अपने नेतागण भी पैसे की चकाचौंध में इस पूरे नरसंहार को केवल राजनितिक फायदे का सौदा समझने लगे हैं और शायद वो भी इन्साफ नहीं चाहते तांकि उनकी राजनीति को "घृणा का कच्चा माल" मिलता रहे ! ऊपर से स्वामी भक्त जानवर नजर आने वाले ये नेतागण अन्दर से जंगली भेडिये ही हैं !

रणवीर सिंघ : याद रहे की "हर तथ्य सत्य नहीं होता" ! इस सन्दर्भ में इन राजनेताओं ने नए-नए तथ्य पैदा किये ! परन्तु वो "तथ्य सत्य नहीं हैं बल्कि इन्साफ को गुमराह करने वाले हैं" ! आखिरी इन्साफ तभी मिलेगा जब हमारे अपने नेताओं में राजनितिक इच्छाशक्ति पैदा होगी और वो अपने हलवे-मांडे को भूल कर इसे एक "कौमी निशाने" की तरह लेंगे वर्ना "दूसरों से इन्साफ की उम्मीद करना उसी प्रकार है जैसे सूर्य का पश्चिम से निकलना !

शायद तुम ठीक कह रहे हो ! कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा - सब बातें हैं, बातों का क्या ? (ठंडी सांस भरते हुए हरबीर सिंघ ने कहा)

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