पंथक सुपरमैन ! (निक्की कविता)
अपने मुंह बडबोले, पर हैं कान के कच्चे !
अन्दर झूठ कपट अहंकार, बनते सच्चे !
पंथक सुपरमैन उड़ते मनमती हवाओं में !
खाकी निक्कर, ऊपर हैं सिख्खी कच्छे !
जब जरूरत हों तो फेंकते बातों के लच्छे !
खुद को बाप समझते, बाकी सब बच्चे !
पंथक सुपरमैन उड़ते मनमती हवाओं में !
खाकी निक्कर, ऊपर है सिख्खी कच्छे !
धर्म के जाल फैलाने में ये सबके चच्चे !
गुरमत के क़त्ल में, इनके होते हैं चर्चे !
पंथक सुपरमैन उड़ते मनमती हवाओं में !
खाकी निक्कर, ऊपर है सिख्खी कच्छे !
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