अंधा बाटें रेवड़ी, फिर फिर अपनों को दे !
मोह में घिरा हुआ आपको मोह से नहीं निकाल सकता ! विकारों से घिरा हुआ विकारों से नहीं निकाल सकता ! परन्तु विचार करने वाला आपको विचार दे सकता है ! विचारों से जुडिये, विचार देने वाले से नहीं ! अंधा जब भी बांटेगा, अपनों को ही बांटेगा ! धृतराष्ट्र जब भी देगा दुर्योधन को देगा, पांडव हमेशा खाली हाथ ही आयेंगे ! ऊँची पदवी की जिमेदारी भी ऊँची होती है, जिसे निभाना हर किसी के बस की बात नहीं होती !
कानों में गुप्त मन्त्र देने वाले हो सकता है की आपको मन्त्र-मुग्ध कर दें पर अंत में आप पाएंगे की आप मन्त्र-मुग्ध नहीं हुए थे बल्कि कुछ पलों के लिए सम्मोहित हो गए थे ... ज्ञान (मन्त्र, नाद, नाम) की प्राप्ति अंदर से ही आएगी ! बाहर का ज्ञान केवल राह बता सकता है, मंजिल नहीं दिला सकता ! आत्मिक ज्ञान परमेश्वर की मंजिल दिलवाएगा और वो भाव अंदर से ही आएगा !
खुद अंधा गुरु आपको केवल अपने तक ही सीमत कर लेता है और खुद को परमेश्वर रूप गुरु बताता है ... पर सच्चा गुरु अपनी आँखें (ज्ञान) आपको दे देता है और साथ चलता है प्रभु मार्ग पर !
गुरु को मंजिल ना मानिये, गुरु एक इशारा है ... मंजिल की ओर ! इशारे को पकड़ कर बैठ जाने वाले ही धर्मान्ध होते है ! धर्मान्ध का अपना कोई ज्ञान नहीं होता (अंदर से प्रकाश नहीं होता), वो तो बाहर के ज्ञान के सहारे (आत्मिक अँधेरे में) टटोल टटोल कर धीरे धीरे बढ़ता है ओर अज्ञानता के गहरे कुएं में गिर कर जीवन लीला का अंत कर लेता है !
प्रभु जब भी प्रगट होंगे, वो आपके अंदर से ही प्रगट होंगे ! परमेश्वर जन्म-मरण से परे है ! जो जन्म ओर मृत्यु के घेरे में आ गया वो प्रभु नहीं हो सकता ! वो उत्तम पुरुष हो सकता है, वो महापुरुष हो सकता है पर प्रभ ? कदापि नहीं !
गीता से जुडिये, गुरु ग्रन्थ साहिब से जुडिये, बाइबल से जुडिये, कुरान शरीफ से जुडिये .. ओर धर्म ग्रंथों से जुडिये..... पर इन ज्ञान के बीच प्रभु को रखिये ! इस से आप इन ग्रंथों को बेहतर तरीके से समझ जायेंगे ! ग्रंथों के पाठ का तोता रटन करने से प्रभु नहीं मिलते, प्रभु मिलते हैं उस पाठ को जिंदगी में ढालने से ! सच आचार का जीवन जीने से ! धर्म (दया) का जीवन जीने से !
गुरु हवा के सामान है जो सब को बिना भेदभाव के बराबर मिलती है ! गुरु पानी के समान है .... गुरु सूर्ये की रौशनी के समान है ! गुरु के मर्म को समझना है तो गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही सच-आचार (सदाचार) है !
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