A space for stories that matter

Every life hides a powerful story

Short stories, poems & fearless ideas

ਹਰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਹੈ ਇੱਕ ਨਿੱਕੀ ਕਹਾਣੀ
Balvinder Singh Bison

माली काका ! (निक्की कहानी)

बेटा, आपने जिस तरह से “पार्क की क्यारी” की तरह कांट-छांट कर दाढ़ी रखी है उससे मुझे लगा कि शायद आप माली का काम करते हैं ! दाढ़ी कटे सिख नवयुवक को देख कर जगजीत सिंघ कलपते हुए बोला! दस्तार (पगड़ी) तो आपने बहुत सुन्दर सजाई है, पर दाढ़ी और केश कहाँ हैं ? ये तो वही बात हो गयी कि जैसे सुन्दर वस्त्र तो धारण किये हैं पर नीचे पैंट की जगह “कच्छा” ही धारण किया हो !

खीं .. खीं.. खीं... खिसियानी हसीं हँसता हुआ मनजोत बोला : छोडो अंकल जी, आप भी शुरू हो गए ?

बेटा अगर बुरा ना मानो तो एक बात बताओगे ? पूछो अंकल जी, मनजोत ने कहा !

जगजीत सिंघ : यह दाढ़ी काटनी कब शुरू की ? और क्या आप शराब आदि भी पीते हो ?

मनजोत : मेरे सारे दोस्त काटते थे, उनको देख कर ही मैंने भी शुरू कर दी ! वह कहते हैं कि इस का फ़ायदा बहुत है .. जब मर्जी सरदार बन जाओ, पगड़ी बाँध कर और जब चाहे हिन्दू जैसे दिखने लग जाओ ! टोपी पहन लो, कोई पहचान नहीं पाता ! दारू पियो और सारे काम करो, कोई रोकने वाला नहीं !

जगजीत सिंघ : इसका मतलब आप “अमृतधारी” तो नहीं बन पाए पर “इच्छाधारी” जरूर बन गए हो ! जब चाहते हो, रूप बदल लेते हो ? क्यों ?

आप जैसे दिन में पचास आते हैं समझाने ! आपको शायद पता नहीं कि मैं रोज़ गुरुदुवारे जाता हूँ, सिख्खी तों मन की होती है, बहार दिखावे में क्या रखा है ?

जगजीत सिंघ : शायद आपने ठीक ही कहा कि आप की सिख्खी “अपने मन की ही है” वर्ना अगर कहीं “गुरु की सिख्खी” आपको कहीं मिल जाती तो बेटा जी शायद आप ऐसे नहीं कहते ! मनुष्य की अदालत से तो आप भाग कर कहीं भी खिसक सकते हो, पर भगवान् की अदालत से भाग कर कोई कैसे जा सकता है ? केवल “गुरुद्वारे (धर्म स्थान) जाकर बैठ जाना” ही सिख्खी नहीं, बल्कि “गुरु” के “द्वार” पर “समर्पण करना” ही सिख्खी है ! जो विचार कहे की “विकार-विकार”, उस विचार को मारो ! जो विचार कहे की प्रभु से “प्यार-प्यार”, उस विचार की सार लो !

मनजोत : बात तो आपकी कुछ कुछ समझ में आ रही है, पर मेरे तो सारे दोस्त वैसे ही हैं, विषय विकारों में फंसे हुए !

जगजीत सिंघ : बेटा, एक काम करो, कुछ समय के लिए अपनी संगत बदल कर देखो ! गुरु किरपा जरूर करेगा ! गुरुद्वारे जा कर केवल माथा मत टेको, बल्कि कुछ समय के लिए वहां बैठो और गुरबाणी समझने की कोशिश करो ! हो सके तो खुद पाठ करना आरंभ करो !

मनजोत : ठीक है, मैं कोशिश करूँगा की कल से ही गुरु साहिब की संगत (गुरबाणी को समझ कर पढना) करूँगा !

Leave a Comment

Reader Comments