झूठों का सरदार ! (निक्की कविता)
आज तक जिसे भी भगवान् समझा,
वही कच्ची मिटटी का बुत निकला !
मोह माया से दूर रहो, जो था कहता,
खुद गले तक डूबा लक्ष्मी पुत्र निकला !
नशे शराब को जी भर भर था जो कोसता,
कमरे में बोतल से एक घूँट कम निकला !
जो देता आशीर्वाद बंद कमरे में लड़कियों को,
वही सन्यासी के भेष में बलात्कारी निकला !
भक्तों का वोट बैंक, नेता को बेच जो गया,
रंगीला साधू झूठों का बड़ा सरदार निकला !
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