कातिल और शातिर (निक्की कविता)
वो तो कातिल है, उनसे इन्साफ की उम्मीद कैसी ?
तुम ने भी अपना बन कर कौन सा तीर मार दिया ?
कातिल से इन्साफ माँगना हमारी वक्ती मजबूरी है !
तुम भी बस अपने बन कर भावनाओं से खेलते रहे !
उसने हुकूमते दुश्मन बन निर्दोषों का लहू है बहाया !
पर तुमने भी तो भाई बन भाई की पीठ में छुरा मारा !
उन्होंने बहुसंख्यक खुश करने के लिए क़त्ल किया !
तुम भी अल्पसंख्यको को मारने के लिए मशहूर हो !
धर्म निरपेक्षता के नारे वाले, यकीनन हमारे कातिल हैं !
धर्म के परदे के पीछे बच्चे बने बैठे, वो भी बड़े शातिर हैं !
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