सच की रखवाली ! (निक्की कहानी)
आज उसकी पिटाई पक्की है... जब देखो बकवास करता रहता है भगवान् के खिलाफ ! (राकेश गुस्से से बोल रहा था)
मुकेश : छोड़ो भैया, थोडा समझा कर देख लिया ना ? जब आप ने देख लिया की उसके विचार पक चुके हैं और उसने समझना ही नहीं तो फिर समझाने में समय क्यों गवां रहे हो ?
राकेश : उसकी इतनी हिम्मत, वो अपने आप को बड़ा विद्वान समझता है ! हम कोई मूर्ख हैं ?
मुकेश (हँसते हुए) : पानी में लस्सी घोल रहे हो आप ! लगे रहो ... एक विद्वान (जो समझता है की मैं सब जानता हूँ) को समझाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुनकिन है ! जिसको लगता है कि उसे सब पता है .. ऐसे इंसान को कैसे समझाया जा सकता है ? अपने राह पर चलो ... आज बहुत समय इस बात पर गवाया जा रहा है की दुसरे क्या बोल रहे हैं! यह लोग आपका समय खराब करने आये हैं .. अपने राह चलो .. प्रचार करो सच का ! पर सच की रखवाली में समय ना गंवाओं ... सच हमेशा से ही प्रगट है .. सच किसी विद्वान का मुहताज नहीं है !
राकेश : पर उसकी बात के खिलाफ अगर सच भी लिख देता हूँ तो वह गालियाँ निकालने तक आ जाता है और तर्क-कुतर्क करता है !
मुकेश : अगर ऐसे लोग नहीं होंगे तो फिर आप जैसे लोगो का धीरज (patience) कैसे परखा जाएगा ? अगर उनके कुबोल सुन कर आपका गुस्सा बढ़ जाए तो भाई इसका मतलब है कि आपकी गाड़ी अभी कच्चे राह पर ही चल रही है और सच की शाही सड़क (हाइवे) पर नहीं आयी ! कच्चे राहों पर गाड़ियाँ अक्सर पंक्चर होती हैं और रुक जाती हैं !
राकेश : पर वो तो हमेशा ही धर्म-ग्रन्थों के श्लोकों के साथ कोई ना कोई कहानी जोड़ कर सुनाता है और इतिहास और मिथिहास का घाला-माला कर देता है !
मुकेश : धर्म-ग्रंथों के श्लोकों को सही अर्थों में समझना चाहिए, उनकी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ना कि उनके साथ व्यर्थ की कहानियां जोड़ कर आम आदमी को बेवकूफ बनाने का धंदा करना ! प्रभु के गुण समझने और उन गुणों के अपने में समाहित करने को तत्पर रहना ही सही राह है ! विद्वान वह नहीं होता जो किसी के राह पर चले, बल्कि विद्वान तो खोज करता है! वह अपनी विद्वता का ढिंढोरा नहीं पीटता बल्कि अपनी विद्वता की मनमोहनी संगीत रुपी खुशबू सब तरफ फैला देता है !
राकेश (विचार करते हुए) : भाई, मैं समझ गया .. आगे से मैं ऐसे लोगों के साथ विचार तो करूँगा पर तकरार (बहिसबाजी) में नहीं पडूंगा ! बीमार सोच से लड़ाइयाँ पैदा होती है और मैं बीमार नहीं हूँ! मैं सच के राजमार्ग (हाइवे) पर चलूँगा और पगडंडियों के काँटों-कीलों से बच कर चलूँगा! बहुत बार समय ही इन जैसे लोगों का इलाज़ होता है, उनके बहकावे में आ कर मैं अपना साधू-स्वभाव क्यों बदलूँ ? हम हैं राही सच के राह के ! सब मेरे भाई-मित्र हैं !
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