धृतराष्ट्र ! (निक्की कहानी )

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गली में सुबह से ही भोंपू चीख रहा था।

“धर्म का मामला है,” पड़ोसी ने समझाया, “थोड़ा शोर तो सहना पड़ेगा।”

अगले दिन दूसरे धर्म का जुलूस निकला। उसी गली में फिर भोंपू गरजा।

वही पड़ोसी इस बार भड़क उठा : “ये लोग इतनी तेज आवाज़ में क्यों बजाते हैं? किसी को आराम भी चाहिए!”

मैंने पूछा,
“कल तो आप कह रहे थे कि धर्म का मामला है, शोर सहना पड़ेगा?”

वह कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला : “वो हमारा धर्म था!”

मैंने कहा : “बस ! यही तो बीमारी है।”

हर कोई अपने दुर्योधन के लिए धृतराष्ट्र बना बैठा है।
दूसरे का धर्म पांडव है और उसे जितना चाहो परेशान होने दो।

भगवान, अल्लाह, गॉड या वाहेगुरु से मिलने के लिए मन को शांत करने की बात करने वाले लोग ही उनके नाम पर गलियों को अशांत कर रहे हैं।

धर्म साधना कम और पार्टी ज्यादा हो गई है।

और पुलिस?

वह भी धृतराष्ट्र के दरबार में दरबारी बन कर खड़ी है :
उसे नागरिक का कान नहीं, नेता और धर्म के ठेकेदार की नाराज़गी सुनाई देती है।

भोंपू बजते रहे...

लेकिन शायद किसी दिन धर्म के मानने वाले को अपने धर्म के नगारखाने में दुसरे धर्म की तूती की आवाज़ भी सुनाई दे।

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