जरूरत की चाबी ! (निक्की कहानी )

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“यार, वो मुझे छोड़ गया… शायद मुझमें ही कोई कमी थी।”

दोस्त बोला,
“नहीं भाई, कमी तुझमें नहीं थी।”

“फिर?”

“तू बस उसके लिए चाबी ही था।”

“चाबी?”

“हाँ! किसी बंद ताले को खोलने के लिए।”

“तो अब मुझे क्यों छोड़ दिया?”

दोस्त ने हँसकर कहा—

“क्योंकि ताला खुल गया…
और साहब को चाबी संभालकर रखने की आदत थी ही नहीं!
ताला खुल गया, अब काम खत्म, चाबी की जरूरत खत्म!”

वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—

“शायद मेरी सबसे बड़ी भूल यही थी…
मैं भावनाओं के वेग में इसे रिश्ता समझता रहा,
और वो मुझे सिर्फ़ ‘जरूरत’ समझता रहा।”

अपने गुणों के लिए परमात्मा को शुक्रिया करो , जिस ने तुमने इस काबिल बनाया कि किसी ताले की चाबी बन सको ! अपने कर्म को करते रहो , दूसरों के कांडों पर घ्यान मत दो !

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