जैसा धन, वैसा अन्न ! (निक्की कहानी )

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“जैसा खाए अन्न, वैसा होवे मन।”

बुज़ुर्ग ने रोटी का कौर तोड़ते हुए कहा।

साथ बैठे विनोद ने तुरंत पूछ लिया—

“बाबा जी, बात तो ठीक है… लेकिन ये अन्न खरीदा किस धन से?”

बुज़ुर्ग ने रोटी का निवाला मुँह तक ले जाते अपना हाथ रोक लिया।

“ओए! तूने तो रोटी को भी आयकर विभाग बना दिया!”

सब हँस पड़े।

विनोद बोला—

“नहीं बाबा जी, बात गंभीर है। अन्न सिर्फ खेत में नहीं उगता, उसे खरीदने के लिए धन भी चाहिए। फिर सवाल ये है—जैसा धन, वैसा अन्न… और जैसा अन्न, वैसा मन।”

बुज़ुर्ग ने सिर हिलाया।

“सच कहता है। अगर धन किसी का हक मारकर, धोखा देकर, रिश्वत लेकर या किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर कमाया हो, तो थाली चाहे कितनी महँगी हो, मन कैसे साफ रहेगा? वो तो पाप कर्म ही सोचेगा !”

विनोद बोला—

“मतलब फिर प्लेट में पड़ी दाल से पहले पैसे की चाल देखनी पड़ेगी?”

बुज़ुर्ग हँस पड़ा।

“हाँ पुत्र! कई बार आदमी रोटी तो घी लगाकर खाता है, लेकिन उस घी के पीछे किसी और के हक का निचोड़ होता है!”

“गीता भी कहती है—
‘भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।’
यानी बात सिर्फ अन्न की नहीं, उसके पीछे की नीयत और कर्म की भी है।”

अर्थात मेहनत की कमाई करके खाना और उसमें से अपनी सामर्थ्य अनुसार बाँटना—यही सही राह है।

विनोद ने आखिरी कौर उठाया और बोला—

“तो बात सिर्फ इतनी नहीं कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा होवे मन।’
पहले ये भी पूछ लेना चाहिए—
‘जैसा धन, वैसा अन्न… और जैसा धन, वैसा मन!’”

बुज़ुर्ग बोला—

“बस! अब रोटी खा ले… नहीं तो विचार करते-करते अन्न भी ठंडा हो जाएगा!”

रोटी गर्म थी, मगर इस बात से दिल में ठंडक उतर गई।

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